मंगलवार, 13 जुलाई 2010

साथ

तुम भी साथ छोड़ चले !
ऐसे में तो साथ रहते मेरे...
हंस कर बोला वों -नियति है ....
नहीं रहता पास लूटे-पिटे के
चल देता हूँ
फिर से बहने के लिए
किसी और कि आँखों से...
जब छोड़ गए मंझधार में
जिनके अजीज थे तुम
तो मैं क्यों रहूँ -पास तुम्हारे
गम के सिवाय है कुछ पास तुम्हारे...
कि मैं बना लूं घरोंदा
सूनी आँखों में तुम्हारी ....

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें