रविवार, 4 जुलाई 2010

भ्रूण हत्या

मात्र तीन दी का था मैं...
चाहता था छुपे रहना
अन्तःकरण में ।
क्योंकि  शक्तिहीन था मैं- एक शिशु कि तरह
डर था कहीं असामयिक मृत्यु को न प्राप्त हो जाऊं...
परन्तु,  हे ममत्व कि साक्षात्  देवी !
आशा न थी मुझे तुमसे ऐसी...
तुम्ही ने मुझे उखाड़ फेकने कि साजिश क़ी।
कैसी अभिव्यक्ति है यह ममता क़ी !
हाँ ,तुम्ही को संबोधित हूँ मैं - हे कोमलांगी !
मेरे जीवन प्रयास के बारे में तो सोचा होता!
किसी इमारत क़ी दीवार में उग आया नवजात पौधा था मैं।
कितना कठिन प्रयास था पाने को एक जीवन...
परन्तु तुमने ही मुझे नोच डाला
तुम्ही पर अर्पित था मैं,हे ! प्रेम क़ी साक्षात्  प्रतिमा...
क्यों नहीं परिपक्व होने दिया मुझे?
क्या प्रेम का फल भी कडवा होता है ?
यदि नहीं
तो पनपने देती मुझे हे विशाल हृदय नारी !
मात्र तीन दिन के भ्रूण को...

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